




भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान की राजनीति में जब भी कोई नेता जनभावनाओं को ललकारता है, तो उसकी आवाज केवल भाषण नहीं, सियासी संकेत बन जाती है। नागौर के सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के मुखिया हनुमान बेनीवाल ने जयपुर के मानसरोवर मैदान में ‘युवा आक्रोश रैली’ के जरिए वही किया। लेकिन यह कोई सामान्य रैली नहीं थी, यह था युवा आक्रोश का एक विस्फोट, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से शुरू होकर एसआई भर्ती, आरपीएससी घोटाले और जातिवाद के आरोपों तक जा पहुंचा।
बेनीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा, ‘रगों में लहू नहीं, सिंदूर बहा दिया गया।’ यह बयान केवल राजनीतिक तंज नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक प्रतीक था। सिंदूर भारतीय संस्कृति में श्रद्धा और मर्यादा का प्रतीक है, और इसी प्रतीक का इस्तेमाल कर उन्होंने मोदी सरकार के सैन्य अभियानों और उनकी नीतियों पर संवेदनात्मक हमला बोला।
सवाल यह नहीं कि उन्होंने पीओके क्यों नहीं लिया; सवाल यह है कि क्या ये सवाल युवा वर्ग के दिल में पहले से थे और बेनीवाल ने उन्हें आवाज दी? रैली में सबसे तीखा हमला भाजपा और कांग्रेस दोनों पर एक साथ था। एसआई भर्ती में धांधली, आरपीएससी की निष्क्रियता, एसओजी की जाति आधारित कार्रवाई, पेपर माफिया और मंत्री की पोती के नकल का मामला। इन सबके ज़रिए बेनीवाल ने प्रदेश की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया। सवाल उठते है, क्या ये वाकई सच्चे मुद्दे हैं या केवल चुनावी ट्रिगर? या फिर यह जनता के उन असंतोषों की सूची है जिन्हें अब तक किसी ने ठीक से छुआ ही नहीं?

हनुमान बेनीवाल कोई सामान्य क्षेत्रीय नेता नहीं हैं। वे उस ‘तीसरे विकल्प’ के प्रतीक बनते जा रहे हैं, जो भाजपा और कांग्रेस के बीच ‘थक चुके वोटर’ को आकर्षित करता है। खासकर बेरोजगारी, पेपर लीक, जातीय भेदभाव जैसे मुद्दों पर जब मुख्यधारा की पार्टियां बचाव में नजर आती हैं, तब बेनीवाल का सीधा हमला उन्हें युवा वर्ग का नेता बनने की दिशा में ले जाता है।
यह भी गौर करने वाली बात है कि बेनीवाल ने सीबीआई जांच की मांग, आरपीएससी भंग करने की मांग, और भर्ती घोटालों पर टाइमबाउंड एक्शन जैसे कदमों की पैरवी की। ये केवल नारे नहीं हैं, ये न्यायिक-प्रशासनिक सुधारों की मांगें हैं, जिन्हें अनसुना करना सरकार के लिए राजनीतिक आत्मघात जैसा हो सकता है।
हनुमान बेनीवाल की यह रैली भाजपा के लिए स्पष्ट संकेत है कि 2024 जैसा समर्थन मिलना भी अब मुश्किल हो सकता है। गठबंधन की राजनीति में बेनीवाल अगर खुलकर विरोध पर उतर आए, तो राजस्थान की 25 सीटों में कई समीकरण बदल सकते हैं। भविष्य की राजनीति में आरएलपी की यह रैली किंगमेकर या डीलब्रेकर की भूमिका निभा सकती है।
आरएलपी नेता कपिल सहारण कहते हैं, ‘राजस्थान का युवा अब किसी ‘पर्ची वाले मुख्यमंत्री’ को स्वीकारने को तैयार नहीं। न ही वो पेपर लीक और जातिवाद के गठजोड़ को बर्दाश्त करना चाहता है। ऐसे में हनुमान बेनीवाल का ‘आक्रोश’ केवल भाषण नहीं, बल्कि युवा मतदाता की उस चुप आवाज़ को मंच देना है, जो पिछले कई सालों से अनसुनी रह गई।’


