






डॉ. एमपी शर्मा.
हर दिन किसी न किसी मरीज की साँस डॉक्टर की सूझबूझ पर टिकी होती है। हर रात किसी घर की नींद, एक चिकित्सक की जागरूकता से जुड़ी होती है। डॉक्टर सिर्फ एक पेशा नहीं निभाते, वे उम्मीद की आखिरी किरण, और कई बार जीवन की आखिरी उम्मीद होते हैं। एक जुलाई, भारत में ’राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस’ के रूप में उस निस्वार्थ सेवा को नमन करने का दिन है, जो डॉक्टर समाज को प्रतिदिन देते हैं। यह दिन उस महान विभूति, डॉ. बिधान चंद्र रॉय को समर्पित है, जिन्होंने चिकित्सा को राष्ट्रसेवा से जोड़ा। आज जब चिकित्सा के पेशे को कभी प्रशंसा, तो कभी संदेह की नजरों से देखा जाता है, तब यह दिन हमें डॉक्टरों के प्रति विश्वास, सम्मान और आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देता है।
1 जुलाई, भारतवर्ष में ‘राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति में समर्पित है। एक ऐसे महान चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, समाजसेवी और पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री, जिन्होंने न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में, बल्कि भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अमिट छाप छोड़ी। संयोगवश उनका जन्म और निधन, दोनों 1 जुलाई को ही हुआ था।
चिकित्सा एक पेशा नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना और समर्पण का जीवन है। डॉक्टर केवल दवा नहीं देता, वह जीवन को दिशा देता है। बीमार शरीर ही नहीं, कभी-कभी टूटे हुए हौसलों, थकी हुई आंखों और निराश दिलों को भी संबल देता है। डॉक्टर का काम सूरज की तरह होता है, बिना भेदभाव के उजाला फैलाना।
डॉ. बी.सी. रॉय ने इंग्लैंड से एमआरसीपी और एफआरसीएस की उपाधि प्राप्त की और भारत लौटकर चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति ला दी। उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के गठन में अहम भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन में कई प्रमुख शहर जैसे दुर्गापुर, बिधाननगर और कंचरापाड़ा विकसित हुए। वे मानते थे कि ‘चिकित्सा केवल उपचार नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है।’
आज के दौर में जब सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी, अफवाहें और चिकित्सा को व्यवसायिक दृष्टि से देखने की मानसिकता बढ़ रही है, तब डॉक्टरों के सामने केवल बीमारी नहीं, अविश्वास और हिंसा जैसी चुनौतियाँ भी हैं। डॉक्टरों को केवल मरीज़ नहीं, समाज से संवाद करना है। डॉक्टर अब केवल इलाज करने वाला नहीं, एक मार्गदर्शक, शिक्षक और मानसिक सहारा भी है।
एक डॉक्टर का जीवन अनुशासन, त्याग और सतत अध्ययन से भरा होता है। वह त्योहार, परिवार, थकान और नींद के ऊपर मरीज़ की जिंदगी को प्राथमिकता देता है। कोविड काल में हमने देखा कि कैसे डॉक्टरों ने पीपीई किट में घंटों पसीना बहाया, अपनों से दूर रहकर दूसरों की साँसों को बचाया।
आज आवश्यकता है कि डॉक्टरों को केवल आपातकाल में नहीं, हर दिन सम्मान और सुरक्षा मिले। अस्पतालों में हिंसा के विरुद्ध कड़े कानून बनें और लागू हों। जनजागरण हो कि डॉक्टर आपकी जान बचाने वाला मित्र है, दुश्मन नहीं।
जो युवा आज इस पेशे में हैं या प्रवेश ले रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि यह आदर का रास्ता है लेकिन आसान नहीं। यहाँ प्रतिष्ठा है परंतु त्याग भी उतना ही है। मरीज के शरीर से पहले उसके मन तक पहुँचना आपकी सफलता है।
1 जुलाई, केवल एक तारीख नहीं, एक विचार है, कि चिकित्सा सेवा है, विश्वास है, और सबसे बढ़कर मानवता की पूजा है। डॉक्टरों को धन्यवाद कहना एक औपचारिकता नहीं, समाज की कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। आईएमए राजस्थान के अध्यक्ष के नाते मैं प्रदेश के हर चिकित्सक को इस दिन हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। आप सबके समर्पण से ही यह समाज स्वस्थ, जागरूक और सुरक्षित बना है। सदैव गर्व करें कि आप एक डॉक्टर हैं, जीवन के प्रहरी।
-लेखक सुविख्यात सीनियर सर्जन व आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं




